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महात्मा गांधी की जान बचाने वाले बत्तक मियां अंसारी

प्रोफ़ेसर जाबिर हुसैन

यह तस्वीर बत्तक अंसारी (निधन 1957) की है। मुमकिन है, इधर- उधर, चर्चा में, आपने यह नाम सुना हो। लेकिन 1990 से पहले यह नाम इतिहासकारों की स्मृति में भी नहीं था। चम्पारण की गाथाएं सुनाने वालों को भी अक्सर यह नाम याद नहीं रहता। उस दौर की कई ऐतिहासिक महत्व की आत्मकथाएं भी इस नाम के उल्लेख से महरूम हैं। जाने क्यों!

1917 में, चम्पारण आंदोलन के दौरान, अंग्रेजों ने गांधी जी के क़त्ल की साज़िश रची थी। इसके पीछे एक मुस्लिम ख़ानसामा को मोहरा बनाकर पूरे देश में साम्प्रदायिक दंगों की भट्ठी सुलगाने की योजना छिपी थी।

याद रहे, यह वही 1917 का समय था, जब रोहतास (तब शाहाबाद) ज़िले के गांवों में साम्प्रदायिक उन्माद में डूबे सामन्ती प्रभुओं ने हाथी-घोड़ों पर सवार होकर मुस्लिम बस्तियों पर हमले किए थे। आगे चलकर, कई अन्य स्थानों पर भी साम्प्रदायिक दंगों का फैलाव हुआ। बहार हुसैनाबादी (1864-1929) ने अपनी उर्दू आत्मकथा ‘सकरात‘ में विस्तार से इस फ़िज़ाबंदी का ब्योरा पेश किया है।


The Ambedkar-Gandhi Debate


अंग्रेजों की योजना थी, बत्तक अंसारी के हाथों गांधी जी को दूध में ज़हर देकर मार दिया जाए। प्रलोभनों के साथ, ऐसा नहीं करने पर बत्तक अंसारी को जान से हाथ धोने की धमकियां दी गई थीं। देशभक्त बत्तक अंसारी ने अंग्रेजों का दमन और अत्याचार झेलने का संकल्प किया और गांधी जी को अंग्रेजों की इस साज़िश से आगाह कर दिया। कहते हैं, दूध का गिलास ज़मीन पर उलट दिया गया और एक बिल्ली उसे चाटकर मौत की नींद सो गई।


When Ambedkar wrote that the assassination of Gandhi would be good for the Country



देश के प्रथम राष्ट्रपति श्रद्धेय राजेंद्र प्रसाद स्वयं इस घटना के प्रत्यक्ष गवाह थे। 1950 से 1962 तक उन्होंने बिहार सरकार को गांधी की जान बचाने वाले इस देशभक्त को अंग्रेज़ों द्वारा छीनी गई ज़मीन लौटाने और उनके बेटे मुहम्मद जान अंसारी समेत पूरे परिवार को आर्थिक संरक्षण देने का निदेश दिया था। वो बत्तक की देशभक्ति से अभिभूत थे। बाद में, राष्ट्रपति भवन में बतौर ख़ास मेहमान उनके बेटे को परिवार सहित रखा गया था।

1990 में, राज्य अल्पसंख्यक आयोग ने पहली बार इस पूरे प्रकरण को उजागर किया और प्रमाण सहित बत्तक अंसारी के वंशजों को न्याय दिलाने की कारगर पहल की। तब कहीं मीडिया का ध्यान इस ओर गया, और देश-भर के समाचार-माध्यमों में उनका नाम उछला।



95 Year Old Maimuna Khatoon Recalls the Day When Gandhi was Killed.



बाद में, विधान परिषद् के प्रभावकारी हस्तक्षेप से बत्तक अंसारी के गांव में उनका स्मारक बना, मज़ार का निर्माण हुआ, उनकी याद में जिला मुख्यालय में ‘संग्रहालय‘ का निर्माण किया गया। उन्हें ज़मीन दी गई। कुछ और बायदे पूरे होने को अभी बाकी हैं। ‘संग्रहालय‘ से भी अर्द्ध-सैनिक बलों का कब्जा हटाना बाक़ी है।

एक सवाल अक्सर दिमाग़ को परेशान करता है : जब यह घटना हुई, देश की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले कई लोग इसके गवाह बने, लेकिन बत्तक अंसारी की देशभक्ति की यह दास्तान गुमनामी के पर्दे में दबी रह गई। क्यों हुआ आख़िर ऐसा!

प्रोफ़ेसर जाबिर हुसैन : लेखक पुर्व सांसद हैं, और बिहार विधान परिषद के सभापति भी रह चुके हैं जो हिंदी, उर्दू तथा अंग्रेज़ी जैसी भाषाओं में समान अधिकार के साथ लेखन करते रहे हैं। इन्हे साल 2005 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

 


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